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Author: Ashok Kumar
Brand: Anuugya
Edition: Ist
Binding: hardcover
Number Of Pages: 124
Release Date: 01-12-2021
Details: भाषा, व्याकरण और तमामविद्याओं के दाता भगवान शिव ने सप्त ऋषियों को ज्ञान देते समय नाट्य शास्त्र को पाँचवाँ वेद करार दिया था। काव्य यदि कला का उत्कृष्ट रूप है तो नाटक कला का उत्कृष्टतम रूप है। नाटक में अभिव्यक्ति की सम्पूर्णता है–रस है, भाव है, भंगिमाएँ हैं, नृत्य है, शब्द है, नाद है, संगीत है, शिल्प है और ये ललित कलाओं से ओतप्रोत है। इतने सहस्त्र युगों के बाद और इतने बर्बर आक्रान्ताओं के बाद भी अगर नाट्य शास्त्र उपलब्ध है तो इसकी दो ही प्रमुख वजह हो सकती हैं–एक हमारी पुरातन श्रुति-स्मृति वाली परम्परानुगत चली आ रही शिक्षा पद्धति और दूसरे हमारे पूर्वजों की हिम्मत और संरक्षण क्षमता। भरत मुनि द्वारा नाट्य शास्त्र की प्रतियाँ संस्कृत और हिन्दी में उपलब्ध हैं और जैसे गोरों ने हमारी तमाम विद्याओं को ‘हज्म’ करके उसे अपनी कहकर हमें ही सिखाने की कोशिश की है उस कड़ी में नाट्य शास्त्र कई विदेशी भाषाओं में अनुवादित हुआ और उस पर कई प्रकार के शोध भी हुए। ग्रीक दार्शनिक एिरस्टोटल ने शायद अपने मौलिक विचार लिखे हों लेकिन नाटक/कहानी की संरचना/ढाँचे पर उसने अपनी पुस्तक ‘पोएिटक्स’ में भी लिखा है। मैंने जब लेखन और सिनेमा की शिक्षा प्राप्त की तब, जैसा के आम होता है, मुझे भी केवल पाश्चात्य लोगों के काम के द्वारा ही सिखाया गया। हमें सिखाया गया कि जो-जो कुछ महान है वह केवल बाहर के लोगों ने ही किया है, हमने केवल उन्हीं से सीख कर उन्हीं का अनुसरण किया है। जब से मेरी समझ में यह आया है तब से मैं अपने क्लासेज में लेखन और फिल्म एप्प्रेसिअशन के लेक्चर्स में नाट्य शास्त्र और लेखन/नाटक/सिनेमा जगत में भारतीयों के योगदान का जिक्र करता हूँ। ...इसी पुस्तक से...
Package Dimensions: 9.1 x 6.3 x 0.8 inches
Languages: Hindi
Original: $2.13
-65%$2.13
$0.75Product Information
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Description
Author: Ashok Kumar
Brand: Anuugya
Edition: Ist
Binding: hardcover
Number Of Pages: 124
Release Date: 01-12-2021
Details: भाषा, व्याकरण और तमामविद्याओं के दाता भगवान शिव ने सप्त ऋषियों को ज्ञान देते समय नाट्य शास्त्र को पाँचवाँ वेद करार दिया था। काव्य यदि कला का उत्कृष्ट रूप है तो नाटक कला का उत्कृष्टतम रूप है। नाटक में अभिव्यक्ति की सम्पूर्णता है–रस है, भाव है, भंगिमाएँ हैं, नृत्य है, शब्द है, नाद है, संगीत है, शिल्प है और ये ललित कलाओं से ओतप्रोत है। इतने सहस्त्र युगों के बाद और इतने बर्बर आक्रान्ताओं के बाद भी अगर नाट्य शास्त्र उपलब्ध है तो इसकी दो ही प्रमुख वजह हो सकती हैं–एक हमारी पुरातन श्रुति-स्मृति वाली परम्परानुगत चली आ रही शिक्षा पद्धति और दूसरे हमारे पूर्वजों की हिम्मत और संरक्षण क्षमता। भरत मुनि द्वारा नाट्य शास्त्र की प्रतियाँ संस्कृत और हिन्दी में उपलब्ध हैं और जैसे गोरों ने हमारी तमाम विद्याओं को ‘हज्म’ करके उसे अपनी कहकर हमें ही सिखाने की कोशिश की है उस कड़ी में नाट्य शास्त्र कई विदेशी भाषाओं में अनुवादित हुआ और उस पर कई प्रकार के शोध भी हुए। ग्रीक दार्शनिक एिरस्टोटल ने शायद अपने मौलिक विचार लिखे हों लेकिन नाटक/कहानी की संरचना/ढाँचे पर उसने अपनी पुस्तक ‘पोएिटक्स’ में भी लिखा है। मैंने जब लेखन और सिनेमा की शिक्षा प्राप्त की तब, जैसा के आम होता है, मुझे भी केवल पाश्चात्य लोगों के काम के द्वारा ही सिखाया गया। हमें सिखाया गया कि जो-जो कुछ महान है वह केवल बाहर के लोगों ने ही किया है, हमने केवल उन्हीं से सीख कर उन्हीं का अनुसरण किया है। जब से मेरी समझ में यह आया है तब से मैं अपने क्लासेज में लेखन और फिल्म एप्प्रेसिअशन के लेक्चर्स में नाट्य शास्त्र और लेखन/नाटक/सिनेमा जगत में भारतीयों के योगदान का जिक्र करता हूँ। ...इसी पुस्तक से...
Package Dimensions: 9.1 x 6.3 x 0.8 inches
Languages: Hindi

















