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AADIVASI VIDHROH | आदिवासी विद्रोह by केदार प्रसाद मीणा

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AADIVASI VIDHROH | आदिवासी विद्रोह by केदार प्रसाद मीणा

Author: KEDAR PRASAD MEENA

Brand: Anuugya

Edition: First Edition

Features:


  • WW Hunter CE Buckland, Analysis of Research on Tribal Literature

  • Sidhi Manjhi, Kanu Majhi, Balai Majhi, Thakur ka Parwana, Poetry of Hools, List of Tribals Rebells. Language Published: Hindi

  • Hools & problems of Expression, about Santhal Hools - not included in the history

  • Culture and Rituals of Tribes, Famous Revolts of Tribes in India, Revolts of Tribes in Jharkhand, Santhal Tribes & their revolts

  • Santhal Hools in Bajad Anhad Dhool, True history of Santhal Hools, Novels of Santhal Hools
    Language Published: Hindi

Binding: paperback

Number Of Pages: 344

Release Date: 01-01-2015

Details: पुस्तक में कई अनकही बातें कही हैं। इसे पढऩे से ज्ञात होता है कि लेखक ने संथाल- विद्रोह 'हूल' पर यह शोध मात्र शैक्षणिक व शास्त्रीय दृष्टिकोण से नहीं किया है बल्कि इसके प्रस्तुतीकरण और अभिव्यक्ति में उनकी निजी रुचि भी स्पष्ट झलकती है। संभवत: यही कारण है कि आर्चर, बोडिंग, कल्शा और हंटर जैसे अंग्रेज लेखकों- शोधकर्ताओं के साथ ही इनको हिंदी में भारतीय लेखकों द्वारा 'हूल' पर प्रस्तुत विविध सामग्री का भी विस्तृत अध्ययन करना पड़ा है। इसके उपरांत इन्होंने राकेश कुमार सिंह के उपन्यास 'जो इतिहास में नहीं है' एवं मधुकर सिंह के उपन्यास 'बाजत अनहद ढोल' को केंद्र में रखकर अपना महत्वपूर्ण शोध-प्रबंध तैयार किया है। इस अध्ययन से जो मूल निष्कर्ष सामने आया है उसके अनुसार 'हूल' बड़ा जनांदोलन था और अब से पहले इसकी विषयवस्तु की अनदेखी भारतीय भाषा के लेखकों द्वारा बड़े पैमाने पर की गयी है। इसके अतिरिक्त इससे पूर्व जो थोड़ा बहुत लेखन हुआ है, उसमें प्रायोजित मानसिकता अधिक दिखती है व तथ्यों का विश्लेषण भी अपनी-अपनी सुविधानुसार किया गया प्रतीत होता है। मेरे लिए भी यह चौंकाने वाला तथ्य है कि वर्ष 2005 में जब 'हूल' के डेढ़ सौ वर्ष पूरे हुए थे तब इस ऐतिहासिक घटना को स्मरण करने के लिए किसी भी प्रकार का कोई सरकारी आयोजन हमारे देश में नहीं हुआ। डॉ. केदार प्रसाद मीणा की भाषा सरल व बोधगम्य है। इस कारण प्रस्तुत तथ्य व विचार शब्दों के जाल में उलझे प्रतीत नहीं होते। इसलिए आशा की जा सकती है कि उनके द्वारा श्रमपूर्वक एकत्रित की गयी सामग्री पर किये गये प्रस्तुत शोध से आदिवासी विद्रोहों के प्रति व्याप्त दुराग्रहों के शमन में सहायता मिलेगी, अनेक भ्रांतियाँ दूर होंगी और उपनिवेश काल में किये गये इन बड़े आदिवासी-विद्रोहों को भारतीय इतिहास में उचित स्थान मिल पायेगI।

EAN: 9789383962143

Package Dimensions: 8.5 x 5.6 x 1.1 inches

Languages: Hindi, English

$2.35
AADIVASI VIDHROH | आदिवासी विद्रोह by केदार प्रसाद मीणा
$2.35

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Description

Author: KEDAR PRASAD MEENA

Brand: Anuugya

Edition: First Edition

Features:


  • WW Hunter CE Buckland, Analysis of Research on Tribal Literature

  • Sidhi Manjhi, Kanu Majhi, Balai Majhi, Thakur ka Parwana, Poetry of Hools, List of Tribals Rebells. Language Published: Hindi

  • Hools & problems of Expression, about Santhal Hools - not included in the history

  • Culture and Rituals of Tribes, Famous Revolts of Tribes in India, Revolts of Tribes in Jharkhand, Santhal Tribes & their revolts

  • Santhal Hools in Bajad Anhad Dhool, True history of Santhal Hools, Novels of Santhal Hools
    Language Published: Hindi

Binding: paperback

Number Of Pages: 344

Release Date: 01-01-2015

Details: पुस्तक में कई अनकही बातें कही हैं। इसे पढऩे से ज्ञात होता है कि लेखक ने संथाल- विद्रोह 'हूल' पर यह शोध मात्र शैक्षणिक व शास्त्रीय दृष्टिकोण से नहीं किया है बल्कि इसके प्रस्तुतीकरण और अभिव्यक्ति में उनकी निजी रुचि भी स्पष्ट झलकती है। संभवत: यही कारण है कि आर्चर, बोडिंग, कल्शा और हंटर जैसे अंग्रेज लेखकों- शोधकर्ताओं के साथ ही इनको हिंदी में भारतीय लेखकों द्वारा 'हूल' पर प्रस्तुत विविध सामग्री का भी विस्तृत अध्ययन करना पड़ा है। इसके उपरांत इन्होंने राकेश कुमार सिंह के उपन्यास 'जो इतिहास में नहीं है' एवं मधुकर सिंह के उपन्यास 'बाजत अनहद ढोल' को केंद्र में रखकर अपना महत्वपूर्ण शोध-प्रबंध तैयार किया है। इस अध्ययन से जो मूल निष्कर्ष सामने आया है उसके अनुसार 'हूल' बड़ा जनांदोलन था और अब से पहले इसकी विषयवस्तु की अनदेखी भारतीय भाषा के लेखकों द्वारा बड़े पैमाने पर की गयी है। इसके अतिरिक्त इससे पूर्व जो थोड़ा बहुत लेखन हुआ है, उसमें प्रायोजित मानसिकता अधिक दिखती है व तथ्यों का विश्लेषण भी अपनी-अपनी सुविधानुसार किया गया प्रतीत होता है। मेरे लिए भी यह चौंकाने वाला तथ्य है कि वर्ष 2005 में जब 'हूल' के डेढ़ सौ वर्ष पूरे हुए थे तब इस ऐतिहासिक घटना को स्मरण करने के लिए किसी भी प्रकार का कोई सरकारी आयोजन हमारे देश में नहीं हुआ। डॉ. केदार प्रसाद मीणा की भाषा सरल व बोधगम्य है। इस कारण प्रस्तुत तथ्य व विचार शब्दों के जाल में उलझे प्रतीत नहीं होते। इसलिए आशा की जा सकती है कि उनके द्वारा श्रमपूर्वक एकत्रित की गयी सामग्री पर किये गये प्रस्तुत शोध से आदिवासी विद्रोहों के प्रति व्याप्त दुराग्रहों के शमन में सहायता मिलेगी, अनेक भ्रांतियाँ दूर होंगी और उपनिवेश काल में किये गये इन बड़े आदिवासी-विद्रोहों को भारतीय इतिहास में उचित स्थान मिल पायेगI।

EAN: 9789383962143

Package Dimensions: 8.5 x 5.6 x 1.1 inches

Languages: Hindi, English