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ADIVASI SAMAJ,SAHITYA AUR RAJNIT by Kedar Prasad Meena ??????? ????, ??????? ?? ??????? ????? ?????? ???? [Paperback] Kedar Prasad Meena

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ADIVASI SAMAJ,SAHITYA AUR RAJNIT by Kedar Prasad Meena ??????? ????, ??????? ?? ??????? ????? ?????? ???? [Paperback] Kedar Prasad Meena

Author: Kedar Prasad Meena

Brand: Anuugya

Edition: First Edition

Features:

  • Jharkhand ka Aadiwasi Samaj
  • Jharkhand ke Aadiwasi aur Hindi Upnyas
  • Aadiwasi ke halateaur Rajneetik Sawal
  • Aadiwasi Sangharsh aur Shibu Soren, Govt. Lies an Intervies of Shibu Soren
  • Rise of Shibu Soren in Politics by Shailendra Mehto, Question of Jharkhand State

Binding: paperback

Number Of Pages: 184

Release Date: 01-12-2016

Details: पुस्तक में उपन्यास साहित्य के बहाने आदिवासी समुदायों और उनके राजनीतिक संघर्ष को गहरे से समझाने की सफल कोशिश की है। झारखंड के आदिवासी भी देश के अन्य आदिवासी समुदायों की तरह सदियों से संघर्षरत हैं, बल्कि कई अर्थों में तो देश के बाकि आदिवासियों से अधिक ही। ये सदियों से महाजनों. जमींदारों की लूट व अंग्रेजी सरकार की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ विद्रोह करते रहे हैं। तिलका मांझी, सिदो-कान्हू, तेलंगा खडिय़ा, बिरसा मुंडा आदि कई आदिवासी नायकों ने शोषण मुक्त समाज के लिए बलिदान दिया है। आज़ादी के बाद भी आदिवासी हर प्रकार से शोषण के शिकार हैं। नेहरु ने वेरियर एल्विन से तो वादा किया कि आदिवासी इलाकों को बाहरी हस्तक्षेप से मुक्त रखा जाएगा, किंतु वास्तव में उनकी सरकार ने नये ‘‘तीर्थ स्थलों’’ (विकास परियोजनायें) के लिए आदिवासियों की जमीनें छीनने की शुरुआत की। तब से आज तक आदिवासी लगातार उजाड़े जा रहे हैं, लूटे जा रहे हैं। पुस्तक में विश्लेषण के कई केंद्र हैं, इनमें सबसे महत्वपूर्ण केंद्र है—शिबू सोरेन और उसकी शुरूआती जनवादी राजनीति का अध्ययन। हालांकि सोरेन और उनकी पार्टी-झारखंड मुक्ति मोर्चा- आज भी संघर्षरत है और अब तक कई बड़ी राजनीतिक भूमिकाएं भी ये निभा चुके हैं, पर इस पार्टी के गठन से पूर्व का शिबू सोरेन एक भिन्न ही किस्म का आदिवासी जननायक है। केदार सही ही लिखते हैं कि वह बिरसा मुंडा के बाद के सबसे प्रभावशाली आदिवासी नेता-जननायक हैं। अगर खुद सोरेन के संथाल समुदाय की संघर्ष परंपरा में देखा जाय तो वह 1855 के संथाल ‘हूल’ के नायकों के बाद सबसे बड़े व्यक्तित्व हैं। लेखक की इस बात का आधार वही शिबू सोरेन है, जिसने सत्तर के दशक में संथालपरगना में धानकटिया आन्दोलन जैसे बड़े-बड़े आन्दोलन चलाये हैं। — रणेंद्र

EAN: 9789383962761

Package Dimensions: 8.5 x 5.5 x 0.6 inches

Languages: Hindi

$1.93
ADIVASI SAMAJ,SAHITYA AUR RAJNIT by Kedar Prasad Meena ??????? ????, ??????? ?? ??????? ????? ?????? ???? [Paperback] Kedar Prasad Meena
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Description

Author: Kedar Prasad Meena

Brand: Anuugya

Edition: First Edition

Features:

  • Jharkhand ka Aadiwasi Samaj
  • Jharkhand ke Aadiwasi aur Hindi Upnyas
  • Aadiwasi ke halateaur Rajneetik Sawal
  • Aadiwasi Sangharsh aur Shibu Soren, Govt. Lies an Intervies of Shibu Soren
  • Rise of Shibu Soren in Politics by Shailendra Mehto, Question of Jharkhand State

Binding: paperback

Number Of Pages: 184

Release Date: 01-12-2016

Details: पुस्तक में उपन्यास साहित्य के बहाने आदिवासी समुदायों और उनके राजनीतिक संघर्ष को गहरे से समझाने की सफल कोशिश की है। झारखंड के आदिवासी भी देश के अन्य आदिवासी समुदायों की तरह सदियों से संघर्षरत हैं, बल्कि कई अर्थों में तो देश के बाकि आदिवासियों से अधिक ही। ये सदियों से महाजनों. जमींदारों की लूट व अंग्रेजी सरकार की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ विद्रोह करते रहे हैं। तिलका मांझी, सिदो-कान्हू, तेलंगा खडिय़ा, बिरसा मुंडा आदि कई आदिवासी नायकों ने शोषण मुक्त समाज के लिए बलिदान दिया है। आज़ादी के बाद भी आदिवासी हर प्रकार से शोषण के शिकार हैं। नेहरु ने वेरियर एल्विन से तो वादा किया कि आदिवासी इलाकों को बाहरी हस्तक्षेप से मुक्त रखा जाएगा, किंतु वास्तव में उनकी सरकार ने नये ‘‘तीर्थ स्थलों’’ (विकास परियोजनायें) के लिए आदिवासियों की जमीनें छीनने की शुरुआत की। तब से आज तक आदिवासी लगातार उजाड़े जा रहे हैं, लूटे जा रहे हैं। पुस्तक में विश्लेषण के कई केंद्र हैं, इनमें सबसे महत्वपूर्ण केंद्र है—शिबू सोरेन और उसकी शुरूआती जनवादी राजनीति का अध्ययन। हालांकि सोरेन और उनकी पार्टी-झारखंड मुक्ति मोर्चा- आज भी संघर्षरत है और अब तक कई बड़ी राजनीतिक भूमिकाएं भी ये निभा चुके हैं, पर इस पार्टी के गठन से पूर्व का शिबू सोरेन एक भिन्न ही किस्म का आदिवासी जननायक है। केदार सही ही लिखते हैं कि वह बिरसा मुंडा के बाद के सबसे प्रभावशाली आदिवासी नेता-जननायक हैं। अगर खुद सोरेन के संथाल समुदाय की संघर्ष परंपरा में देखा जाय तो वह 1855 के संथाल ‘हूल’ के नायकों के बाद सबसे बड़े व्यक्तित्व हैं। लेखक की इस बात का आधार वही शिबू सोरेन है, जिसने सत्तर के दशक में संथालपरगना में धानकटिया आन्दोलन जैसे बड़े-बड़े आन्दोलन चलाये हैं। — रणेंद्र

EAN: 9789383962761

Package Dimensions: 8.5 x 5.5 x 0.6 inches

Languages: Hindi

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