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Bhale Tum Aur Bhi Naraaz Ho Jao [Paperback] Sanjay Kumar Kundan

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Bhale Tum Aur Bhi Naraaz Ho Jao [Paperback] Sanjay Kumar Kundan

Author: Sanjay Kumar Kundan

Brand: Anuugya Books

Edition: 1

Features:

  • Poetry, Sanjay kumar Kundan, Shairee

Binding: paperback

Number Of Pages: 102

Release Date: 01-12-2018

Details: इस तरह संजय कुमार कुन्दन की कविता दोनों ाुबानों के बीच बने पुल पर आवाजाही के सिलसिले को मजबूत करती है। उनकी कविता सब मेेें शामिल है लेकिन उस पर किसी और का रंग नहीं चढ़ा है। उनमें खुल जाने में छुपने का एक अन्दाज़ सा है। उसमें तंग हुरू$फ में चुप को लिखने की सलाहियत भी है। एक सजग राजनीतिक चेतना और बोहेमियनपन दोनों उसमें हैं। वह दुनिया के उस बड़े ताजिर को पहचानती है जो चाँद की भी तिजारत कर रहा है। हमारे समय की तमाम हलचलों और विडम्बनाओं को इन $गज़लों और नज़्मों में कभी संकेतों की तरह और कभी मुखर वाग्मिता की तरह पढ़ा सुना जा सकता है। हाकिमे-शहृ चाहता है कि लोग उसके व$क्त के अँधेरे को उजाला कहें। समय की चीख़ सिलवा दिये गये होठों के पीछे जमा हो गयी है। लेकिन सिर्फ हताशा का ही दृश्य नहीं है। संजय की कविता की निगाह इसके विरुद्ध हो रहे प्रतिरोध पर भी है। इसलिए $फरमाने-ाुबाँबन्दी अगर शाह की ता$कत है तो इन $फरमानों को तोडऩे वाले साहबे-गु$फ्तार भी कम नहीं हैं। कभी मुक्तिबोध ने लिखा था कि लेखक की कठिनाई यह नहीं है कि कमी है विषयों की, बल्कि यह है कि आधिक्य उनका ही उसे सताता है, कि वह उनमें से ठीक चुनाव कर नहीं पाता है। संजय कुमार कुन्दन को भी लगता है कि असलूब याने शैलियाँ भी बहुत हैं, ारिया-ए-इज़हार भी बहुत हैं लेकिन जो कवि की ...शायर की बेचैनियाँ हैं उनके कष्ट बहुत हैं। इसलिए वह कुछ हद तक इसकी परवाह किये बिना कि यह शायरी है या नहीं है इस पर अधिक जोर देता है कि जो महसूस किया बस वही फरमाया है। —राजेश जोशी

Package Dimensions: 9.0 x 6.0 x 0.4 inches

Languages: Hindi

$0.41

Original: $1.18

-65%
Bhale Tum Aur Bhi Naraaz Ho Jao [Paperback] Sanjay Kumar Kundan

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Description

Author: Sanjay Kumar Kundan

Brand: Anuugya Books

Edition: 1

Features:

  • Poetry, Sanjay kumar Kundan, Shairee

Binding: paperback

Number Of Pages: 102

Release Date: 01-12-2018

Details: इस तरह संजय कुमार कुन्दन की कविता दोनों ाुबानों के बीच बने पुल पर आवाजाही के सिलसिले को मजबूत करती है। उनकी कविता सब मेेें शामिल है लेकिन उस पर किसी और का रंग नहीं चढ़ा है। उनमें खुल जाने में छुपने का एक अन्दाज़ सा है। उसमें तंग हुरू$फ में चुप को लिखने की सलाहियत भी है। एक सजग राजनीतिक चेतना और बोहेमियनपन दोनों उसमें हैं। वह दुनिया के उस बड़े ताजिर को पहचानती है जो चाँद की भी तिजारत कर रहा है। हमारे समय की तमाम हलचलों और विडम्बनाओं को इन $गज़लों और नज़्मों में कभी संकेतों की तरह और कभी मुखर वाग्मिता की तरह पढ़ा सुना जा सकता है। हाकिमे-शहृ चाहता है कि लोग उसके व$क्त के अँधेरे को उजाला कहें। समय की चीख़ सिलवा दिये गये होठों के पीछे जमा हो गयी है। लेकिन सिर्फ हताशा का ही दृश्य नहीं है। संजय की कविता की निगाह इसके विरुद्ध हो रहे प्रतिरोध पर भी है। इसलिए $फरमाने-ाुबाँबन्दी अगर शाह की ता$कत है तो इन $फरमानों को तोडऩे वाले साहबे-गु$फ्तार भी कम नहीं हैं। कभी मुक्तिबोध ने लिखा था कि लेखक की कठिनाई यह नहीं है कि कमी है विषयों की, बल्कि यह है कि आधिक्य उनका ही उसे सताता है, कि वह उनमें से ठीक चुनाव कर नहीं पाता है। संजय कुमार कुन्दन को भी लगता है कि असलूब याने शैलियाँ भी बहुत हैं, ारिया-ए-इज़हार भी बहुत हैं लेकिन जो कवि की ...शायर की बेचैनियाँ हैं उनके कष्ट बहुत हैं। इसलिए वह कुछ हद तक इसकी परवाह किये बिना कि यह शायरी है या नहीं है इस पर अधिक जोर देता है कि जो महसूस किया बस वही फरमाया है। —राजेश जोशी

Package Dimensions: 9.0 x 6.0 x 0.4 inches

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