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Dalit Vaichariki Aur Sahitya

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Dalit Vaichariki Aur Sahitya

Author: Prof Dayashankar

Brand: Anuugya

Edition: 1

Features:

  • Daya Shankar, Dalit Sahitya, Dalit Literature, Vaicharki, Dalit Literature

Binding: hardcover

Release Date: 01-12-2018

Details: सच्चाई यह है कि धर्म, राजनीति, राष्ट्र, दलित के मुद्दे पर न तो इनका सरलीकरण किया जा सकता है और न ही ये अपने विचारों में हमेशा जड़ थे और न ही आगे चलकर कभी न सेतु बनने वाले दो धु्रवान्त। लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि ये सभी मतलबी किस्म के अवसरवादी थे। इन सबकी चिन्ताएँ बहुत बड़ी थीं, उनमें राष्ट्र था, धर्म था, दलित थे। रास्ते अलग-अलग थे, प्रश्न सिर्फ इनके उच्चावच का था। अम्बेडकर का तो कोई सवाल ही नहीं, लेकिन गाँधी और प्रेमचन्द दलितों के विरोधी नहीं थे। लेकिन यह भी सही है कि दलित प्रश्न पर उनका रास्ता अम्बेडकर से अलग, काँग्रेसी राष्ट्रवादी था। अपने को सनातनी हिन्दू कहने वाले महात्मा गाँधी हिन्दू धर्म के सनातनियों, हिन्दू महासभा, वर्ण-व्यवस्था, स्वराज संघ के नेताओं से दलितों के बारे में अलग ढंग से, काफी उदार होकर सोचते थे, इसलिए उनकी तल्ख आलोचना के शिकार हुए थे। इस मुद्दे पर साहित्यकार प्रेमचन्द की दशा गाँधी जैसी ही थी। तथाकथित हिन्दू धर्म के नेताओं के उलट महात्मा गाँधी उदार हिन्दू धर्म के दायरे में आजादी के संघर्ष को बिना कोई क्षति पहुँचाये दलित प्रश्न का समाधान चाहते थे। ज्योति प्रसाद निर्मल ने प्रेमचन्द की कहानियों के आधार पर उन पर 'ब्राह्मणद्वेषीÓ और 'ब्राह्मणद्रोहीÓ का आरोप लगाया था और प्रेमचन्द ने उसका बहुत तीखा जवाब 8 जनवरी, 1934 के जागरण के सम्पादकीय में देते हुए कहा था कि ''टकेपन्थी पुजारी, पुरोहित और पंडे हिन्दू जाति के कलंक हैं'' उनकी दृष्टि में सच्चे ब्राह्मण ज्योति प्रसाद निर्मल नहीं, बल्कि महात्मा गाँधी, नेहरू, सरदार पटेल, मालवीय और स्वामी श्रद्धानन्द थे। यह वही स्वामी श्रद्धानन्द थे जिनके सुधार के प्रति अम्बेडकर के मन में बड़ा मान था।

EAN: 9789386810373

Package Dimensions: 9.0 x 6.0 x 0.7 inches

Languages: Hindi

$2.36
Dalit Vaichariki Aur Sahitya
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Description

Author: Prof Dayashankar

Brand: Anuugya

Edition: 1

Features:

  • Daya Shankar, Dalit Sahitya, Dalit Literature, Vaicharki, Dalit Literature

Binding: hardcover

Release Date: 01-12-2018

Details: सच्चाई यह है कि धर्म, राजनीति, राष्ट्र, दलित के मुद्दे पर न तो इनका सरलीकरण किया जा सकता है और न ही ये अपने विचारों में हमेशा जड़ थे और न ही आगे चलकर कभी न सेतु बनने वाले दो धु्रवान्त। लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि ये सभी मतलबी किस्म के अवसरवादी थे। इन सबकी चिन्ताएँ बहुत बड़ी थीं, उनमें राष्ट्र था, धर्म था, दलित थे। रास्ते अलग-अलग थे, प्रश्न सिर्फ इनके उच्चावच का था। अम्बेडकर का तो कोई सवाल ही नहीं, लेकिन गाँधी और प्रेमचन्द दलितों के विरोधी नहीं थे। लेकिन यह भी सही है कि दलित प्रश्न पर उनका रास्ता अम्बेडकर से अलग, काँग्रेसी राष्ट्रवादी था। अपने को सनातनी हिन्दू कहने वाले महात्मा गाँधी हिन्दू धर्म के सनातनियों, हिन्दू महासभा, वर्ण-व्यवस्था, स्वराज संघ के नेताओं से दलितों के बारे में अलग ढंग से, काफी उदार होकर सोचते थे, इसलिए उनकी तल्ख आलोचना के शिकार हुए थे। इस मुद्दे पर साहित्यकार प्रेमचन्द की दशा गाँधी जैसी ही थी। तथाकथित हिन्दू धर्म के नेताओं के उलट महात्मा गाँधी उदार हिन्दू धर्म के दायरे में आजादी के संघर्ष को बिना कोई क्षति पहुँचाये दलित प्रश्न का समाधान चाहते थे। ज्योति प्रसाद निर्मल ने प्रेमचन्द की कहानियों के आधार पर उन पर 'ब्राह्मणद्वेषीÓ और 'ब्राह्मणद्रोहीÓ का आरोप लगाया था और प्रेमचन्द ने उसका बहुत तीखा जवाब 8 जनवरी, 1934 के जागरण के सम्पादकीय में देते हुए कहा था कि ''टकेपन्थी पुजारी, पुरोहित और पंडे हिन्दू जाति के कलंक हैं'' उनकी दृष्टि में सच्चे ब्राह्मण ज्योति प्रसाद निर्मल नहीं, बल्कि महात्मा गाँधी, नेहरू, सरदार पटेल, मालवीय और स्वामी श्रद्धानन्द थे। यह वही स्वामी श्रद्धानन्द थे जिनके सुधार के प्रति अम्बेडकर के मन में बड़ा मान था।

EAN: 9789386810373

Package Dimensions: 9.0 x 6.0 x 0.7 inches

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