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Dorahe Par Vam

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Dorahe Par Vam

Author: Praful Bidwai

Brand: Rajkamal Prakashan

Binding: hardcover

Number Of Pages: 400

Release Date: 01-02-2019

Part Number: 9388753631

Details: एक बड़ा प्रासंगिक सवाल उठता है कि भारत में राजनीतिक दलों के लिए वैधता के एक महत्त्वपूर्ण स्रोत के रूप में वामपंथी राजनीति उस सीमा तक क्यों नहीं विकसित हो पाई जैसा कि बेहिसाब अन्याय और बढ़ती जाती असमानता वाले समाज में अपेक्षित था। दलीय वाम अब प्राथमिक रूप से दो धाराओं में सीमित रह गया है: मुख्यधारा वाले संसदीय साम्यवादी दल और उनके सहयोगी तथा गैर-संसदीय माओवादी अथवा मार्क्सवादी-लेनिनवादी समूह | इस पुस्तक के सरोकार का विषय सीमित है: यह प्राथमिक रूप से संसदीय साम्यवादी दलों पर केन्द्रित है। इस सीमा के पीछे तीन कारक हैं | पहला, मुख्यधारा वाले गुट को भारत की बुर्जुआ उदारवादी लोकतान्त्रिक व्यवस्था-अपनी सीमाओं के बावजूद जिसे जनता से पर्याप्त वैधता प्राप्त है -- से जुड़ने का प्रयास करने का सबसे लम्बा और सबसे समृद्ध अनुभव है और यह प्रगतिशील परिवर्तन और रूपांतरण की संभावनाओं वाली राजनीती के अवसर प्रदान करता है | दूसरे, वामपंथ की सभी धाराओं में मुख्यधारा वाला खेमा सबसे बड़ा है और विविध विभाजनों, असहमतियों और प्र प्रतिद्वान्दिताओं के बावजूद इसका लगातार सबसे लम्बा संगठित अस्तित्व रहा है | तीसरे और यह बात बहुत चकरानेवाली लग सकती है कि मुख्यधारा के वाम पर राज्य केन्द्रित अध्ययनों, लेखों से अलग राष्ट्रीय स्तर पर ताजा विश्लेषणात्मक साहित्य बहुत कम है | आशा है की यह पुस्तक राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर वामपंथी दलों के काम काज के विश्लेषण को उनके विचारधारात्मक आग्रहों, रणनीतिक परिप्रेक्ष्यों, राजनितिक गोलबंदियों के दृष्टिकोणों और संगठनात्मक प्रणालियों तथा व्यवहारों के साथ जोड़कर इस शुन्य को भरने में मदद करेगी |.

EAN: 9789388753630

Package Dimensions: 8.8 x 5.8 x 1.1 inches

Languages: Hindi

$8.17
Dorahe Par Vam
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Product Information

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Description

Author: Praful Bidwai

Brand: Rajkamal Prakashan

Binding: hardcover

Number Of Pages: 400

Release Date: 01-02-2019

Part Number: 9388753631

Details: एक बड़ा प्रासंगिक सवाल उठता है कि भारत में राजनीतिक दलों के लिए वैधता के एक महत्त्वपूर्ण स्रोत के रूप में वामपंथी राजनीति उस सीमा तक क्यों नहीं विकसित हो पाई जैसा कि बेहिसाब अन्याय और बढ़ती जाती असमानता वाले समाज में अपेक्षित था। दलीय वाम अब प्राथमिक रूप से दो धाराओं में सीमित रह गया है: मुख्यधारा वाले संसदीय साम्यवादी दल और उनके सहयोगी तथा गैर-संसदीय माओवादी अथवा मार्क्सवादी-लेनिनवादी समूह | इस पुस्तक के सरोकार का विषय सीमित है: यह प्राथमिक रूप से संसदीय साम्यवादी दलों पर केन्द्रित है। इस सीमा के पीछे तीन कारक हैं | पहला, मुख्यधारा वाले गुट को भारत की बुर्जुआ उदारवादी लोकतान्त्रिक व्यवस्था-अपनी सीमाओं के बावजूद जिसे जनता से पर्याप्त वैधता प्राप्त है -- से जुड़ने का प्रयास करने का सबसे लम्बा और सबसे समृद्ध अनुभव है और यह प्रगतिशील परिवर्तन और रूपांतरण की संभावनाओं वाली राजनीती के अवसर प्रदान करता है | दूसरे, वामपंथ की सभी धाराओं में मुख्यधारा वाला खेमा सबसे बड़ा है और विविध विभाजनों, असहमतियों और प्र प्रतिद्वान्दिताओं के बावजूद इसका लगातार सबसे लम्बा संगठित अस्तित्व रहा है | तीसरे और यह बात बहुत चकरानेवाली लग सकती है कि मुख्यधारा के वाम पर राज्य केन्द्रित अध्ययनों, लेखों से अलग राष्ट्रीय स्तर पर ताजा विश्लेषणात्मक साहित्य बहुत कम है | आशा है की यह पुस्तक राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर वामपंथी दलों के काम काज के विश्लेषण को उनके विचारधारात्मक आग्रहों, रणनीतिक परिप्रेक्ष्यों, राजनितिक गोलबंदियों के दृष्टिकोणों और संगठनात्मक प्रणालियों तथा व्यवहारों के साथ जोड़कर इस शुन्य को भरने में मदद करेगी |.

EAN: 9789388753630

Package Dimensions: 8.8 x 5.8 x 1.1 inches

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