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Hulhulia

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Hulhulia

Author: Ravindra Bharti

Brand: RADHA KRISHNA PRAKASAN PVT LTD

Binding: paperback

Number Of Pages: 120

Release Date: 11-12-2022

Details: रवीन्द्र भारती हिन्दी के उन नाटककारों में हैं जिनके लिखे नाटक पिछले कुछ दशकों से हिन्दी रंगमंच पर लोकप्रिय रहे हैं। उनके लेखकीय सरोकार व्यापक हैं। वे उन समस्याओं, दुश्चिन्ताओं को अपनी रचना में ला रहे हैं जिनसे मनुष्य और समुदाय की पहचान जुड़ी है। ‘हुलहुलिया’ नाटक एक कल्पित जनजाति हुलहुलिया के बारे में है। यह जनजाति पेड़ और पानी के बारे में गहरी जानकारी रखती है। अपने को पेड़ और पानी का डॉक्टर कहती है पर उसकी अपनी पहचान संकट में है। उसके पास कहीं के निवासी होने का कोई लिखित दस्तावेज़ नहीं है। ऐसे समूहों में ज़्यादातर घुमन्तू जनजातियाँ हैं, जिनका मानव-सभ्यता में बड़ा योगदान रहा है। वे नए आविष्कारों को एक जगह से दूसरी जगह पहुँचाती रही हैं, लेकिन राष्ट्र-राज्य के उदय के बाद वे अपने को संकट में पा रही हैं। राज्य उनके होने का प्रमाण माँगता है जो उनके पास नहीं है। उनका क्या होगा? ‘हुलहुलिया’ नाटक ऐसे ही सवालों को उठाता है। नाटक जिस सामाजिक पक्ष की तरफ इशारा करता है, उसकी चर्चा भी ज़रूरी है। जिस कल्याणकारी राज्य की स्थापना आम लोगों के हित में की गई थी, या कम से कम ऐसा सोचा गया था, वह आज अपने में बेहद आततायी बनता जा रहा है। उसके भीतर जो कल्याणकारी तत्त्व बचे हुए थे, उन्हें भी बड़ी पूँजीवाले हड़प ले रहे हैं। ‘हुलहुलिया’ मुख्य रूप से इसी सच का साक्षात्कार कराता है। —रवीन्द्र त्रिपाठी ‘राष्ट्रीय सहारा’, दिल्ली

EAN: 9788195948406

Package Dimensions: 11.0 x 8.7 x 2.0 inches

Languages: Hindi

$0.79

Original: $2.26

-65%
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Description

Author: Ravindra Bharti

Brand: RADHA KRISHNA PRAKASAN PVT LTD

Binding: paperback

Number Of Pages: 120

Release Date: 11-12-2022

Details: रवीन्द्र भारती हिन्दी के उन नाटककारों में हैं जिनके लिखे नाटक पिछले कुछ दशकों से हिन्दी रंगमंच पर लोकप्रिय रहे हैं। उनके लेखकीय सरोकार व्यापक हैं। वे उन समस्याओं, दुश्चिन्ताओं को अपनी रचना में ला रहे हैं जिनसे मनुष्य और समुदाय की पहचान जुड़ी है। ‘हुलहुलिया’ नाटक एक कल्पित जनजाति हुलहुलिया के बारे में है। यह जनजाति पेड़ और पानी के बारे में गहरी जानकारी रखती है। अपने को पेड़ और पानी का डॉक्टर कहती है पर उसकी अपनी पहचान संकट में है। उसके पास कहीं के निवासी होने का कोई लिखित दस्तावेज़ नहीं है। ऐसे समूहों में ज़्यादातर घुमन्तू जनजातियाँ हैं, जिनका मानव-सभ्यता में बड़ा योगदान रहा है। वे नए आविष्कारों को एक जगह से दूसरी जगह पहुँचाती रही हैं, लेकिन राष्ट्र-राज्य के उदय के बाद वे अपने को संकट में पा रही हैं। राज्य उनके होने का प्रमाण माँगता है जो उनके पास नहीं है। उनका क्या होगा? ‘हुलहुलिया’ नाटक ऐसे ही सवालों को उठाता है। नाटक जिस सामाजिक पक्ष की तरफ इशारा करता है, उसकी चर्चा भी ज़रूरी है। जिस कल्याणकारी राज्य की स्थापना आम लोगों के हित में की गई थी, या कम से कम ऐसा सोचा गया था, वह आज अपने में बेहद आततायी बनता जा रहा है। उसके भीतर जो कल्याणकारी तत्त्व बचे हुए थे, उन्हें भी बड़ी पूँजीवाले हड़प ले रहे हैं। ‘हुलहुलिया’ मुख्य रूप से इसी सच का साक्षात्कार कराता है। —रवीन्द्र त्रिपाठी ‘राष्ट्रीय सहारा’, दिल्ली

EAN: 9788195948406

Package Dimensions: 11.0 x 8.7 x 2.0 inches

Languages: Hindi