Jainendra ke Upanyas Mai Mulyon ki arthvatta [Hardcover] Sunita Gupta [Hardcover] Sunita Gupta

Jainendra ke Upanyas Mai Mulyon ki arthvatta [Hardcover] Sunita Gupta [Hardcover] Sunita Gupta
Author: Sunita Gupta
Edition: Ist
Binding: hardcover
Number Of Pages: 344
Release Date: 01-12-2020
Details: मूल्यों के रूढ़ अर्थ के साथ जैनेन्द्र की संतति कठिन जान पड़ती है किन्तु इस पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता इस धारणा से टकराना है। यह पुस्तक इस बात की पड़ताल करती है कि जैनेन्द्र किस प्रकार मूल्यों से मुक्त होते हुए बल्कि कहें कि परम्परागत मूल्यों से मुक्त होते हुए नए व्यक्तिगत मूल्य गढ़ रहे हैं। उनके आरम्भिक लेखन में इन व्यक्तिगत मूल्यों का अस्तित्व एक विस्फोटक के रूप में अधिक दिखाई पड़ता है। बाद में वे इसे अपने पात्रों के सहज क्रियाकलापों से सूक्ष्म रूप में भी संकेतित करते हैं। अपने रचनाकर्म के उत्तराद्र्ध में जैनेन्द्र अधिक समाजोन्मुखी हो जाते हैं जो उनके पूर्वाद्र्ध के 'जैनेन्द्र' होने के आस्वाद को थोड़ा कम-सा करता है। राजनीति में नए मूल्य बोध के साथ उतरा 'जयबद्र्धन' नए मूल्यों की जो आशा जगाता है उसमें यथार्थपरक क्रियान्वयन थोड़ा कठिन भले भी मालूम होता है। किन्तु उसमें असहयोग आन्दोलन में सक्रिय कार्यकर्ता रहे जैनेन्द्र के अनुभव भी हैं। इसी तरह स्त्री सम्बन्धी उनकी नई सोच एक ठोस क्रांतिकारी स्त्री को गढऩे में कितनी सफल या असफल है, यह पुस्तक इससे भी जूझती है। जैनेन्द्र के उपन्यास मानव जीवन की सार्थकता की चिन्ता करते हैं। डॉ. धर्मवीर भारती के शब्दों में कहें तो ''सार्थकता का पहलू सबसे बड़ा मानव मूल्य है।'' हम चाहे जिस युग में जैसी भी जटिलताओं को जिये हमारे सुखों-दुखों, आशाओं-निराशाओं, निर्माणों-ध्वंसों की परिभाषा और प्रयुक्ति तत्कालीन मूल्यों को साथ ले या उनसे लड़-भिड़ कर ही आगे बढ़ती है। जैनेन्द्र का साहित्य, विशेषकर उनके उपन्यास इसका सबसे अच्छा उदाहरण हैं और यह पुस्तक विस्तारपूर्वक इसका विश्लेषण करती है। —प्रो. रूपा गुप्ता,वर्धमान विश्वविद्यालय, प. बंगाल
Package Dimensions: 9.8 x 6.3 x 0.8 inches
Languages: Hindi
Original: $6.27
-65%$6.27
$2.19Product Information
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Shipping & Returns
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Description
Author: Sunita Gupta
Edition: Ist
Binding: hardcover
Number Of Pages: 344
Release Date: 01-12-2020
Details: मूल्यों के रूढ़ अर्थ के साथ जैनेन्द्र की संतति कठिन जान पड़ती है किन्तु इस पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता इस धारणा से टकराना है। यह पुस्तक इस बात की पड़ताल करती है कि जैनेन्द्र किस प्रकार मूल्यों से मुक्त होते हुए बल्कि कहें कि परम्परागत मूल्यों से मुक्त होते हुए नए व्यक्तिगत मूल्य गढ़ रहे हैं। उनके आरम्भिक लेखन में इन व्यक्तिगत मूल्यों का अस्तित्व एक विस्फोटक के रूप में अधिक दिखाई पड़ता है। बाद में वे इसे अपने पात्रों के सहज क्रियाकलापों से सूक्ष्म रूप में भी संकेतित करते हैं। अपने रचनाकर्म के उत्तराद्र्ध में जैनेन्द्र अधिक समाजोन्मुखी हो जाते हैं जो उनके पूर्वाद्र्ध के 'जैनेन्द्र' होने के आस्वाद को थोड़ा कम-सा करता है। राजनीति में नए मूल्य बोध के साथ उतरा 'जयबद्र्धन' नए मूल्यों की जो आशा जगाता है उसमें यथार्थपरक क्रियान्वयन थोड़ा कठिन भले भी मालूम होता है। किन्तु उसमें असहयोग आन्दोलन में सक्रिय कार्यकर्ता रहे जैनेन्द्र के अनुभव भी हैं। इसी तरह स्त्री सम्बन्धी उनकी नई सोच एक ठोस क्रांतिकारी स्त्री को गढऩे में कितनी सफल या असफल है, यह पुस्तक इससे भी जूझती है। जैनेन्द्र के उपन्यास मानव जीवन की सार्थकता की चिन्ता करते हैं। डॉ. धर्मवीर भारती के शब्दों में कहें तो ''सार्थकता का पहलू सबसे बड़ा मानव मूल्य है।'' हम चाहे जिस युग में जैसी भी जटिलताओं को जिये हमारे सुखों-दुखों, आशाओं-निराशाओं, निर्माणों-ध्वंसों की परिभाषा और प्रयुक्ति तत्कालीन मूल्यों को साथ ले या उनसे लड़-भिड़ कर ही आगे बढ़ती है। जैनेन्द्र का साहित्य, विशेषकर उनके उपन्यास इसका सबसे अच्छा उदाहरण हैं और यह पुस्तक विस्तारपूर्वक इसका विश्लेषण करती है। —प्रो. रूपा गुप्ता,वर्धमान विश्वविद्यालय, प. बंगाल
Package Dimensions: 9.8 x 6.3 x 0.8 inches
Languages: Hindi

















