Kaha Yaksh Ne : Suno Megh Tum (Meghdoot Anuvaad Kavita) ??? ???? ?? : ???? ??? ??? (?????? ?????? ?????) [Hardcover] Ravindra K. Das / ???????? ??. ???

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Author: Ravindra K. Das / रवीन्द्र के. दास
Brand: Anuugya Books
Edition: Ist
Binding: hardcover
Number Of Pages: 239
Release Date: 01-12-2022
Details: श्री रवीन्द्र कुमार दास ने ‘मेरी बात’ में कहा है कि इस कविता में कुछ तो ऐसा है जो सारी दुनिया के पाठक, सहृदय और आलोचक उससे बिंधे हुए हैं! यह प्रश्न और जिज्ञासा उन्हें मेघदूत की उस आंतरिक दुनिया में ले गई जहां यह कविता के समय, समाज और आदमी के साथ सतत संवाद में है। इस क्रम में उन्हें जड़-वैदुष्य परंपरा से लड़ना पड़ा है और उसी लड़ाई में उन्हें आज की लय और भाषा मिल गई है, कविता फिर से जी उठी है। यह अनुवाद नहीं, पुनःसृजन है। अनुवादक की निगाह और संवेदना, उन मर्मों के भीतर तक धँसी है जहां मिट्टी, हल, किसान और फूल चुनती युवतियों के श्रम-स्वेद-सिंचित मुख से मेघ परिचय कर रहा है – फूल चुनती लनाओं के कानों के मुरझाए कोमल कनपटी से बहते स्वेद धार पर सहे भला क्यों घात कमाल सा सुन्दर मुख उनको देना तुम छाया सुख फिर उसी सहमे से उनसे क्षण भर का परिचय कर लेना रवीन्द्र ने देख लिया है कि कविता में धनपतियों – सामंतों के विलासी सुख के साथ श्रम-सिंचित सौन्दर्य का गहरा संघर्ष निरंतर चल रहा है। इस विश्व प्रसिद्ध कविता का यह गहन जीवन सौन्दर्य है। ‘मेघदूत’ की यह पुनर्रचना आज के सहृदय के साथ खूब बात करती है। – प्रो. नित्यानंद तिवारी
EAN: 9789391034481
Package Dimensions: 9.0 x 6.0 x 0.6 inches
Languages: Hindi
Product Information
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Shipping & Returns
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Description
Author: Ravindra K. Das / रवीन्द्र के. दास
Brand: Anuugya Books
Edition: Ist
Binding: hardcover
Number Of Pages: 239
Release Date: 01-12-2022
Details: श्री रवीन्द्र कुमार दास ने ‘मेरी बात’ में कहा है कि इस कविता में कुछ तो ऐसा है जो सारी दुनिया के पाठक, सहृदय और आलोचक उससे बिंधे हुए हैं! यह प्रश्न और जिज्ञासा उन्हें मेघदूत की उस आंतरिक दुनिया में ले गई जहां यह कविता के समय, समाज और आदमी के साथ सतत संवाद में है। इस क्रम में उन्हें जड़-वैदुष्य परंपरा से लड़ना पड़ा है और उसी लड़ाई में उन्हें आज की लय और भाषा मिल गई है, कविता फिर से जी उठी है। यह अनुवाद नहीं, पुनःसृजन है। अनुवादक की निगाह और संवेदना, उन मर्मों के भीतर तक धँसी है जहां मिट्टी, हल, किसान और फूल चुनती युवतियों के श्रम-स्वेद-सिंचित मुख से मेघ परिचय कर रहा है – फूल चुनती लनाओं के कानों के मुरझाए कोमल कनपटी से बहते स्वेद धार पर सहे भला क्यों घात कमाल सा सुन्दर मुख उनको देना तुम छाया सुख फिर उसी सहमे से उनसे क्षण भर का परिचय कर लेना रवीन्द्र ने देख लिया है कि कविता में धनपतियों – सामंतों के विलासी सुख के साथ श्रम-सिंचित सौन्दर्य का गहरा संघर्ष निरंतर चल रहा है। इस विश्व प्रसिद्ध कविता का यह गहन जीवन सौन्दर्य है। ‘मेघदूत’ की यह पुनर्रचना आज के सहृदय के साथ खूब बात करती है। – प्रो. नित्यानंद तिवारी
EAN: 9789391034481
Package Dimensions: 9.0 x 6.0 x 0.6 inches
Languages: Hindi


















