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Kavi Man Jani Man

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Kavi Man Jani Man

Author: Vandana Tete

Brand: RADHA KRISHNA PRAKASAN PVT LTD

Binding: paperback

Number Of Pages: 264

Release Date: 01-11-2019

Part Number: 8183619363

Details: आदिवासी जनी (स्त्री) मन का धरातल बिलकुल दूसरी तरह का है। आदिवासियत के दर्शन पर खड़ा। समभाव जिसकी मूल प्रकृति है। प्राकृतिक विभेद के अलावा जहाँ इनसान अथवा सत्ता द्वारा कृत्रिम रूप से थोपा हुआ कोई दूसरा भेद नहीं है। हालाँकि कुछ बन्दिशें हैं, परन्तु सामन्ती क्रूरता और धार्मिक आडम्बरों के किले में आदिवासी स्त्री बिलकुल कैद नहीं है। ‘कवि मन जनी मन’ संकलन में वृहत्तर झारखंड के आदिवासी समुदायों की स्त्री-रचनाकारों की कविताएँ शामिल हैं। कवियों में से एक या दो को छोडक़र प्राय: सभी अपनी-अपनी आदिवासी मातृभाषाओं में लिखती हैं। परन्तु संकलन में शामिल कविताएँ मूल रूप से हिन्दी में रची गई हैं। कुछ का हिन्दी अनुवाद है जिसे कवयित्रियों ने स्वयं किया है। हिन्दी में आदिवासी स्त्री कविताओं का मूल या अनुवाद लाना इसलिए जरूरी लगा कि यह समझ बिलकुल साफ हो जाए कि नसों में दौडऩे वाला लहू चाहे कितनी पीढिय़ों का सफर तय कर ले, अपना मूल स्वभाव नहीं छोड़ता। यानी रचने का, गढऩे का और बचाने का स्वभाव। अपने लिए ही नहीं बल्कि सबके लिए, सम्पूर्ण समष्टि की चिन्ता का स्वभाव। पहाड़ी नदी की तरह चंचल, पोखरे की तरह गम्भीर, घर के बीचोबीच खड़ा मजबूत स्तम्भ या कि आर्थिक-सांस्कृतिक पौष्टिकता लिये महुआ-सी महिलाएँ अपने समुदाय की रीढ़ हैं। ठीक वैसे ही उनका लेखन है। वे अपनी कविताओं से विमर्श करती हैं। उनके विमर्श में वर्चस्व की आक्रामकता नहीं बचाव के युद्धगीत हैं। और है रचने का दुर्दम्य आग्रह जिसका सबूत यह संकलन है।

EAN: 9788183619363

Package Dimensions: 8.4 x 5.5 x 0.7 inches

Languages: Hindi

$2.41
Kavi Man Jani Man
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Product Information

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Description

Author: Vandana Tete

Brand: RADHA KRISHNA PRAKASAN PVT LTD

Binding: paperback

Number Of Pages: 264

Release Date: 01-11-2019

Part Number: 8183619363

Details: आदिवासी जनी (स्त्री) मन का धरातल बिलकुल दूसरी तरह का है। आदिवासियत के दर्शन पर खड़ा। समभाव जिसकी मूल प्रकृति है। प्राकृतिक विभेद के अलावा जहाँ इनसान अथवा सत्ता द्वारा कृत्रिम रूप से थोपा हुआ कोई दूसरा भेद नहीं है। हालाँकि कुछ बन्दिशें हैं, परन्तु सामन्ती क्रूरता और धार्मिक आडम्बरों के किले में आदिवासी स्त्री बिलकुल कैद नहीं है। ‘कवि मन जनी मन’ संकलन में वृहत्तर झारखंड के आदिवासी समुदायों की स्त्री-रचनाकारों की कविताएँ शामिल हैं। कवियों में से एक या दो को छोडक़र प्राय: सभी अपनी-अपनी आदिवासी मातृभाषाओं में लिखती हैं। परन्तु संकलन में शामिल कविताएँ मूल रूप से हिन्दी में रची गई हैं। कुछ का हिन्दी अनुवाद है जिसे कवयित्रियों ने स्वयं किया है। हिन्दी में आदिवासी स्त्री कविताओं का मूल या अनुवाद लाना इसलिए जरूरी लगा कि यह समझ बिलकुल साफ हो जाए कि नसों में दौडऩे वाला लहू चाहे कितनी पीढिय़ों का सफर तय कर ले, अपना मूल स्वभाव नहीं छोड़ता। यानी रचने का, गढऩे का और बचाने का स्वभाव। अपने लिए ही नहीं बल्कि सबके लिए, सम्पूर्ण समष्टि की चिन्ता का स्वभाव। पहाड़ी नदी की तरह चंचल, पोखरे की तरह गम्भीर, घर के बीचोबीच खड़ा मजबूत स्तम्भ या कि आर्थिक-सांस्कृतिक पौष्टिकता लिये महुआ-सी महिलाएँ अपने समुदाय की रीढ़ हैं। ठीक वैसे ही उनका लेखन है। वे अपनी कविताओं से विमर्श करती हैं। उनके विमर्श में वर्चस्व की आक्रामकता नहीं बचाव के युद्धगीत हैं। और है रचने का दुर्दम्य आग्रह जिसका सबूत यह संकलन है।

EAN: 9788183619363

Package Dimensions: 8.4 x 5.5 x 0.7 inches

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