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Krishnavtar : Vol. 7 : Yudhishthir

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Krishnavtar : Vol. 7 : Yudhishthir

Author: Kanhaiyalal Maneklal Munshi

Brand: Rajkamal Prakashan

Edition: 13th

Binding: hardcover

Number Of Pages: 176

Release Date: 01-01-2015

Part Number: 8126707615

Details: सुविख्यात गुजराती उपन्यासकार कन्हैयालाल माणिकलाल मंुशी की बहुचर्चित और बहुपठित उपन्यास-माला कृष्णावतार के पूर्वप्रकाशित छह खंडों- बंसी की धुन, रुक्मिणीहरण, पाँच पाण्डव, महाबली भीम, सत्यभामा तथा महामुनि व्यास- के बाद युधिष्ठिर नामक यह सातवाँ खंड है। साथ ही आठवाँ, किन्तु अधूरा खंड ‘कुरुक्षेत्र’ भी। मुंशीजी इससे इस ग्रन्थमाला का समापन करनेवाले थे। ‘महाभारत’ में युधिष्ठिर ‘धर्मराज’ के रूप में विख्यात इतिहासपुरुष हैं। अधर्म, अशान्ति और रक्तपात से उन्हें घोर विरक्ति है। उनकी राजनीति धर्म-साधना का माध्यम-भर है- धर्म को उसका साधन नहीं बनाया जा सकता। यह जानते हुए भी कि कौरव उनका और उनके भाइयों का सर्वस्व हड़प जाना चाहते हैं, युद्ध उन्हें स्वीकार्य नहीं। यही कारण है कि दुर्योधन और शकुनि के षड्यन्त्र को जानते हुए भी वे द्यूतसभा का बुलावा स्वीकार कर लेते हैं और भाइयों आदि के निषेध के बावजूद लगातार हारते चले जाते हैं। उपन्यास में इस समूचे घटनाक्रम के दौरान युधिष्ठिर के अन्तर्द्वन्द्व और बेचैनी का मार्मिक अंकन हुआ है। वनवास और अज्ञातवास के बावजूद अन्ततः उन्हें ‘कुरुक्षेत्र’ जाना पड़ा। और ‘कुरुक्षेत्र’ अधूरा है- यहाँ और जीवन, दोनों जगह। पता नहीं, कब से यह कुरुक्षेत्र हमारे बाहर-भीतर अपूर्ण है और कब तक रहेगा? पर शायद मानव-विकास का बीज भी इसी अपूर्णता में निहित है।.

EAN: 9788126707614

Package Dimensions: 13.1 x 8.3 x 0.8 inches

Languages: Hindi

$3.09
Krishnavtar : Vol. 7 : Yudhishthir
$3.09

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Description

Author: Kanhaiyalal Maneklal Munshi

Brand: Rajkamal Prakashan

Edition: 13th

Binding: hardcover

Number Of Pages: 176

Release Date: 01-01-2015

Part Number: 8126707615

Details: सुविख्यात गुजराती उपन्यासकार कन्हैयालाल माणिकलाल मंुशी की बहुचर्चित और बहुपठित उपन्यास-माला कृष्णावतार के पूर्वप्रकाशित छह खंडों- बंसी की धुन, रुक्मिणीहरण, पाँच पाण्डव, महाबली भीम, सत्यभामा तथा महामुनि व्यास- के बाद युधिष्ठिर नामक यह सातवाँ खंड है। साथ ही आठवाँ, किन्तु अधूरा खंड ‘कुरुक्षेत्र’ भी। मुंशीजी इससे इस ग्रन्थमाला का समापन करनेवाले थे। ‘महाभारत’ में युधिष्ठिर ‘धर्मराज’ के रूप में विख्यात इतिहासपुरुष हैं। अधर्म, अशान्ति और रक्तपात से उन्हें घोर विरक्ति है। उनकी राजनीति धर्म-साधना का माध्यम-भर है- धर्म को उसका साधन नहीं बनाया जा सकता। यह जानते हुए भी कि कौरव उनका और उनके भाइयों का सर्वस्व हड़प जाना चाहते हैं, युद्ध उन्हें स्वीकार्य नहीं। यही कारण है कि दुर्योधन और शकुनि के षड्यन्त्र को जानते हुए भी वे द्यूतसभा का बुलावा स्वीकार कर लेते हैं और भाइयों आदि के निषेध के बावजूद लगातार हारते चले जाते हैं। उपन्यास में इस समूचे घटनाक्रम के दौरान युधिष्ठिर के अन्तर्द्वन्द्व और बेचैनी का मार्मिक अंकन हुआ है। वनवास और अज्ञातवास के बावजूद अन्ततः उन्हें ‘कुरुक्षेत्र’ जाना पड़ा। और ‘कुरुक्षेत्र’ अधूरा है- यहाँ और जीवन, दोनों जगह। पता नहीं, कब से यह कुरुक्षेत्र हमारे बाहर-भीतर अपूर्ण है और कब तक रहेगा? पर शायद मानव-विकास का बीज भी इसी अपूर्णता में निहित है।.

EAN: 9788126707614

Package Dimensions: 13.1 x 8.3 x 0.8 inches

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