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LOCKDOWN (Novel) ??????? (???????) [Hardcover] Laxmi pandey ??????? ??????? [Hardcover] Laxmi pandey ??????? ???????
Author: Laxmi pandey लक्ष्मी पाण्डेय
Brand: Anuugya
Edition: Ist
Binding: hardcover
Number Of Pages: 168
Release Date: 01-12-2021
Details: मृत्यु के खौफ ने जिन्दगियों को एक-दूसरे के करीब कर दिया। क्यों कहते हैं लोग प्रेम भयमुक्त करता है। बाबा तुलसीदास सही कहते हैं– ‘भय िबनु प्रीति न होहिं गुसाँई।’ प्रेम के साथ ही तो भय उत्पन्न होता है। अपने प्रियजनों की सुरक्षा का भय... कहीं कुछ हो न जाए... वह प्रेम अपने परिवार, राष्ट्र, समाज से हो या अपनी जिन्दगी से...। यही देखिए, ये लोग जो भाग-भागकर आ रहे हैं वे, क्या केवल परिवार या प्रियजन के जीवन की, उनके स्वस्थ-सुरक्षित होने की चिन्ता में आ रहे हैं? क्या वे आएँगे तो इनका साथ परिजनों को महामारी से बचा लेगा, ऐसा सोचते हैं ये? नहीं, बिल्कुल नहीं...। परिवार का प्रेम और चिन्ता तो दूसरी बात है पहली बात यह कि ये अपनी जिन्दगी से अदम्य प्रेम करते हैं। इन्हें भय है कि महामारी इनसे इनकी जिन्दगी, इनकी साँसें न छीन ले, इसलिए ये भागकर सुरक्षित स्थान की तलाश में चले आए हैं। अपने माता-पिता के घर से सुरक्षित और अधिकार पूर्ण रहने की जगह और कौन-सी हो सकती है? जो भी हो, इनके अाने से दोनों पक्ष सुखी और निश्चिन्त हो गए। हम जिनसे प्रेम करते हैं उनसे बिछड़ जाने की आशंका भयभीत बनाए रखती है। रात वाले स्वप्न का भय अब तक बना हुआ है। ऐसा नहीं कि यह स्वप्न पहली बार देखा है। इसके पहले भी दो-तीन बार ऐसा ही स्वप्न देखा और परिवार से तो नहीं, मित्रों से चर्चा की तो उन्होंने कहा कि यह अवचेतन में ठहरा हुआ अवसाद है। एकाकीपन का भय या निराशा भी ऐसे स्वप्नों को जन्म देती है, और कुछ नहीं...। —इसी पुस्तक से
Package Dimensions: 9.0 x 6.0 x 0.5 inches
Languages: Hindi
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Description
Author: Laxmi pandey लक्ष्मी पाण्डेय
Brand: Anuugya
Edition: Ist
Binding: hardcover
Number Of Pages: 168
Release Date: 01-12-2021
Details: मृत्यु के खौफ ने जिन्दगियों को एक-दूसरे के करीब कर दिया। क्यों कहते हैं लोग प्रेम भयमुक्त करता है। बाबा तुलसीदास सही कहते हैं– ‘भय िबनु प्रीति न होहिं गुसाँई।’ प्रेम के साथ ही तो भय उत्पन्न होता है। अपने प्रियजनों की सुरक्षा का भय... कहीं कुछ हो न जाए... वह प्रेम अपने परिवार, राष्ट्र, समाज से हो या अपनी जिन्दगी से...। यही देखिए, ये लोग जो भाग-भागकर आ रहे हैं वे, क्या केवल परिवार या प्रियजन के जीवन की, उनके स्वस्थ-सुरक्षित होने की चिन्ता में आ रहे हैं? क्या वे आएँगे तो इनका साथ परिजनों को महामारी से बचा लेगा, ऐसा सोचते हैं ये? नहीं, बिल्कुल नहीं...। परिवार का प्रेम और चिन्ता तो दूसरी बात है पहली बात यह कि ये अपनी जिन्दगी से अदम्य प्रेम करते हैं। इन्हें भय है कि महामारी इनसे इनकी जिन्दगी, इनकी साँसें न छीन ले, इसलिए ये भागकर सुरक्षित स्थान की तलाश में चले आए हैं। अपने माता-पिता के घर से सुरक्षित और अधिकार पूर्ण रहने की जगह और कौन-सी हो सकती है? जो भी हो, इनके अाने से दोनों पक्ष सुखी और निश्चिन्त हो गए। हम जिनसे प्रेम करते हैं उनसे बिछड़ जाने की आशंका भयभीत बनाए रखती है। रात वाले स्वप्न का भय अब तक बना हुआ है। ऐसा नहीं कि यह स्वप्न पहली बार देखा है। इसके पहले भी दो-तीन बार ऐसा ही स्वप्न देखा और परिवार से तो नहीं, मित्रों से चर्चा की तो उन्होंने कहा कि यह अवचेतन में ठहरा हुआ अवसाद है। एकाकीपन का भय या निराशा भी ऐसे स्वप्नों को जन्म देती है, और कुछ नहीं...। —इसी पुस्तक से
Package Dimensions: 9.0 x 6.0 x 0.5 inches
Languages: Hindi


















