Rashtriyata ki Avdharna aur Bhartendu yougin Sahitya | ??????????? ?? ??????? ?? ???????? ????? ??????? by Parmod Kumar [Paperback] Pradmod Kumar [Paperback] Pradmod Kumar

Rashtriyata ki Avdharna aur Bhartendu yougin Sahitya | ??????????? ?? ??????? ?? ???????? ????? ??????? by Parmod Kumar [Paperback] Pradmod Kumar [Paperback] Pradmod Kumar
Author: Pradmod Kumar
Brand: Anuugya
Edition: 2016
Features:
- Economic, Political Conditions of Hindi Belt
- Religion, Rashtriyata : Discussion
- Elements for developing the casts of Hindi Literate Intellectuals
- Different Dimensions of Religion Intellectuals
- Major Incidents for Leaving Impression on Hindi Intellectuals
Binding: paperback
Number Of Pages: 208
Release Date: 01-12-2016
Details: उन्नीसवीं सदी के उत्तराद्र्ध के हिन्दी बौद्धिकों की चिन्ता के केन्द्र में ‘सामान्य जन’ या ‘आम भारतीय’ है। इसी ‘सामान्य जन’ की निगाह से उस समय के साहित्यकारों ने अपने समय को देखा। तत्कालीन ‘भारत दुर्दशा’ से वे विचलित होकर उसके कारणों की पड़ताल करने लगे और ‘भारत वर्षोन्नति कैसे हो’ इसकी राह ढूँढऩे लगे। ‘पै धन विदेस चली जात’ को भारत-दुर्दशा के कारण के रूप में चिह्नित करते हैं और पश्चिम के दिखाये रास्ते पर चलकर भौतिक उन्नति व ‘वैष्णवता’ जैसे पारम्परिक धर्मों के रास्ते ‘आध्यात्मिक उन्नति’ का मार्ग सुझाते हैं। पश्चिम की भौतिक उन्नति अँग्रेजी ढंग की शिक्षा, विज्ञान व तकनीक और दूसरे जगहों से धन लाकर हुई है। इसलिए वे कई बार अँग्रेजी ढंग की शिक्षा व विज्ञान व तकनीक की प्रशंसा करते हैं। लेकिन ‘निज भाषा’ और ‘स्वत्व निज भारत गहै’, वैष्णवता जैसी चीजों के जरिये आध्यात्मिक उन्नति की भी वकालत करते हैं। ये दोनो चीजें परस्पर विरोधी हैं। भारतेन्दु युग का साहित्य इन दोनों परस्पर विरोधी चीजों को एक साथ धारण करने का प्रयास करता है। पश्चिम के रास्ते भौतिक उन्नति और अपनी स्वदेशी परम्पराओं के रास्ते आध्यात्मिक उन्नति हासिल करने की जद्दोजहद भारतेन्दु युग में दिखती है। एक ओर आधुनिक औपनिवेशिक संस्थाओं के प्रति आकर्षण है तो दूसरी ओर उसके शोषक रूप के प्रति विकर्षण भी। अपनी पारम्परिक संस्थाओं के प्रति मोह भी है और उसकी रूढि़वादिता व जड़ता के प्रति क्षोभ भी। परस्पर विरोधी इन मान्यताओं को एक साथ साधने की कोशिश में भारतेन्दु युग की चेतना ऐसा स्वरूप ग्रहण करती है जिसे ‘एम्बीवैलेन्स’ (उभयतोपाश) जैसे साहित्यिक उपकरणों के द्वारा समझा जा सकता है।
EAN: 9789383962754
Package Dimensions: 8.5 x 5.6 x 0.6 inches
Languages: Hindi
Original: $1.97
-65%$1.97
$0.69Product Information
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Description
Author: Pradmod Kumar
Brand: Anuugya
Edition: 2016
Features:
- Economic, Political Conditions of Hindi Belt
- Religion, Rashtriyata : Discussion
- Elements for developing the casts of Hindi Literate Intellectuals
- Different Dimensions of Religion Intellectuals
- Major Incidents for Leaving Impression on Hindi Intellectuals
Binding: paperback
Number Of Pages: 208
Release Date: 01-12-2016
Details: उन्नीसवीं सदी के उत्तराद्र्ध के हिन्दी बौद्धिकों की चिन्ता के केन्द्र में ‘सामान्य जन’ या ‘आम भारतीय’ है। इसी ‘सामान्य जन’ की निगाह से उस समय के साहित्यकारों ने अपने समय को देखा। तत्कालीन ‘भारत दुर्दशा’ से वे विचलित होकर उसके कारणों की पड़ताल करने लगे और ‘भारत वर्षोन्नति कैसे हो’ इसकी राह ढूँढऩे लगे। ‘पै धन विदेस चली जात’ को भारत-दुर्दशा के कारण के रूप में चिह्नित करते हैं और पश्चिम के दिखाये रास्ते पर चलकर भौतिक उन्नति व ‘वैष्णवता’ जैसे पारम्परिक धर्मों के रास्ते ‘आध्यात्मिक उन्नति’ का मार्ग सुझाते हैं। पश्चिम की भौतिक उन्नति अँग्रेजी ढंग की शिक्षा, विज्ञान व तकनीक और दूसरे जगहों से धन लाकर हुई है। इसलिए वे कई बार अँग्रेजी ढंग की शिक्षा व विज्ञान व तकनीक की प्रशंसा करते हैं। लेकिन ‘निज भाषा’ और ‘स्वत्व निज भारत गहै’, वैष्णवता जैसी चीजों के जरिये आध्यात्मिक उन्नति की भी वकालत करते हैं। ये दोनो चीजें परस्पर विरोधी हैं। भारतेन्दु युग का साहित्य इन दोनों परस्पर विरोधी चीजों को एक साथ धारण करने का प्रयास करता है। पश्चिम के रास्ते भौतिक उन्नति और अपनी स्वदेशी परम्पराओं के रास्ते आध्यात्मिक उन्नति हासिल करने की जद्दोजहद भारतेन्दु युग में दिखती है। एक ओर आधुनिक औपनिवेशिक संस्थाओं के प्रति आकर्षण है तो दूसरी ओर उसके शोषक रूप के प्रति विकर्षण भी। अपनी पारम्परिक संस्थाओं के प्रति मोह भी है और उसकी रूढि़वादिता व जड़ता के प्रति क्षोभ भी। परस्पर विरोधी इन मान्यताओं को एक साथ साधने की कोशिश में भारतेन्दु युग की चेतना ऐसा स्वरूप ग्रहण करती है जिसे ‘एम्बीवैलेन्स’ (उभयतोपाश) जैसे साहित्यिक उपकरणों के द्वारा समझा जा सकता है।
EAN: 9789383962754
Package Dimensions: 8.5 x 5.6 x 0.6 inches
Languages: Hindi














