
SATH-ASATH (???-????) [Paperback] Anchit
Author: Anchit
Brand: Anuugya Books
Features:
- Poetry
- Language Published: Hindi
Binding: paperback
Number Of Pages: 80
Release Date: 01-12-2020
Details: अंचित की ये कविताएँ हमसे जिस भाषा की माँग करती हैं– वह भाषा, मैं सच कहूँ– मेरे पास नहीं है। न वो समतुल्य बोधतरंग ही है। ये बिल्कुल नयी, अप्रत्याशित कविताएँ हैं, शायद भावी शताब्दी की कविताएँ। ऐसी कविताएँ हिन्दी में आज से पहले लिखी नहीं गईं। क्योंकि ये अनुभव, भावबोध, जीवन के प्रति ऐसा संवेद पहले था– ही नहीं। यहाँ सब कुछ मिलकर एक हो जाता है और कुछ भी बहिष्कृत नहीं, जैसे कि यह अनुभूतियों का ब्रह्मांडीकरण हो। अनेक भाषा-खंड, महादेश, काल, जीवन, मृत्यु, सब एक साथ एक ही कूँची से निर्मित-अनिर्मित हो पूरी दीवार घेर लेते हैं। हरे जल में जलकुम्भी के पास चाँद, बहुत-सी दीवारों से सटकर रोता एक माथा। और साँस की राख–कब किसने देखा और जाना इस तरह? और भाषा तो जैसे रबर की हो। इतनी लचीली, या प्लास्टिक की, जिससे कोई भी आकार या आकृति बनने से बच न सके। काठ को नदी का पानी छूता है और वह काठ देर तक नम बना रहता है। यहाँ अनेक कवियों-कविताओं की ध्वनि-परछाइयाँ है, और सभी वर्जनाओं का विसर्जन। इतने सारे लोग हैं, इतनी स्त्रियाँ। प्रेम वैसे ही है जैसे रोटी। –अरुण कमल
Languages: Hindi
Product Information
Product Information
Shipping & Returns
Shipping & Returns
Description
Author: Anchit
Brand: Anuugya Books
Features:
- Poetry
- Language Published: Hindi
Binding: paperback
Number Of Pages: 80
Release Date: 01-12-2020
Details: अंचित की ये कविताएँ हमसे जिस भाषा की माँग करती हैं– वह भाषा, मैं सच कहूँ– मेरे पास नहीं है। न वो समतुल्य बोधतरंग ही है। ये बिल्कुल नयी, अप्रत्याशित कविताएँ हैं, शायद भावी शताब्दी की कविताएँ। ऐसी कविताएँ हिन्दी में आज से पहले लिखी नहीं गईं। क्योंकि ये अनुभव, भावबोध, जीवन के प्रति ऐसा संवेद पहले था– ही नहीं। यहाँ सब कुछ मिलकर एक हो जाता है और कुछ भी बहिष्कृत नहीं, जैसे कि यह अनुभूतियों का ब्रह्मांडीकरण हो। अनेक भाषा-खंड, महादेश, काल, जीवन, मृत्यु, सब एक साथ एक ही कूँची से निर्मित-अनिर्मित हो पूरी दीवार घेर लेते हैं। हरे जल में जलकुम्भी के पास चाँद, बहुत-सी दीवारों से सटकर रोता एक माथा। और साँस की राख–कब किसने देखा और जाना इस तरह? और भाषा तो जैसे रबर की हो। इतनी लचीली, या प्लास्टिक की, जिससे कोई भी आकार या आकृति बनने से बच न सके। काठ को नदी का पानी छूता है और वह काठ देर तक नम बना रहता है। यहाँ अनेक कवियों-कविताओं की ध्वनि-परछाइयाँ है, और सभी वर्जनाओं का विसर्जन। इतने सारे लोग हैं, इतनी स्त्रियाँ। प्रेम वैसे ही है जैसे रोटी। –अरुण कमल
Languages: Hindi

















