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Shakespeare Vaya Pro. Swaminathan | ????????? ???? ????. ?????????? by ?????????? ??? [Paperback] Kantikumar Jain [Paperback] Kantikumar Jain

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Shakespeare Vaya Pro. Swaminathan | ????????? ???? ????. ?????????? by ?????????? ??? [Paperback] Kantikumar Jain [Paperback] Kantikumar Jain

Author: Kantikumar Jain

Brand: Anuugya Books

Edition: 1

Features:

  • meoirs, best memoire author,
  • memoirs in hinid,

Binding: paperback

Number Of Pages: 260

Release Date: 01-12-2017

Details: रजनीश उस समय रजनीश मोहन जैन थे, सांवले, लंबे और छरहरे। बीस-इक्कीस साल के रहे होंगे। लंबा ढीला कुर्ता और ढीली धोती पहिनते थे। कुर्ता गाढ़े का था, पैरों मे चप्पलें। तब भी वे नकिया कर बोलते। मुझे बहुत अच्छी तरह याद है कि उनके भाषणों में कई बार 'इंसान खों गया हैÓ, 'हमारे भीतर की लालटेन बुझ गई हैÓ जैसे वाक्य आए थे। 'इंसान खों गया हैÓ तो उस पूरे भाषण की टेक जैसा था। बड़ा आदर्श से भरा हुआ उनका भाषण था, नए मूल्यों को स्थापित करने का आग्रह लिए हुए एवं अपनी नई खोज की स्वीकृति का इसरार करता हुआ। कुछ अंग्रेजी के शब्द भी उनके भाषण में आए थे। तब वे 'शÓ नहीं बोल पाते थे, शेक्सपियर को सेक्सपियर बोलते। 'जÓ का उच्चारण भी उनके लिए असंभव था। बोलते समय भाषण में उनकी आँखें बंद हो जातीं और लगता वे शून्य को संबोधित कर रहे हैं। बहुत दिनों तक हम लोग छात्रावास में उनके नकियाने और इज, वाज, बिकाज की गाज गिराने की नकल करते रहे थे। अपने अंग्रेजी के प्रोफेसर स्वामीनाथन् साहब की शेक्सपियर की क्लास में जाना होता तो अपने सहपाठी शशिकान्त से कहते–काय ससी, सेक्सपियर पढऩे नहीं चल रये का। पर इस नकियाने और इज, वाज बिकाज की गाज गिराने के बावजूद रजनीश मोहन जैन प्रथम स्थान के अधिकारी घोषित किए गए थे।

Package Dimensions: 9.0 x 6.0 x 0.5 inches

Languages: Hindi

$0.69

Original: $1.97

-65%
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Description

Author: Kantikumar Jain

Brand: Anuugya Books

Edition: 1

Features:

  • meoirs, best memoire author,
  • memoirs in hinid,

Binding: paperback

Number Of Pages: 260

Release Date: 01-12-2017

Details: रजनीश उस समय रजनीश मोहन जैन थे, सांवले, लंबे और छरहरे। बीस-इक्कीस साल के रहे होंगे। लंबा ढीला कुर्ता और ढीली धोती पहिनते थे। कुर्ता गाढ़े का था, पैरों मे चप्पलें। तब भी वे नकिया कर बोलते। मुझे बहुत अच्छी तरह याद है कि उनके भाषणों में कई बार 'इंसान खों गया हैÓ, 'हमारे भीतर की लालटेन बुझ गई हैÓ जैसे वाक्य आए थे। 'इंसान खों गया हैÓ तो उस पूरे भाषण की टेक जैसा था। बड़ा आदर्श से भरा हुआ उनका भाषण था, नए मूल्यों को स्थापित करने का आग्रह लिए हुए एवं अपनी नई खोज की स्वीकृति का इसरार करता हुआ। कुछ अंग्रेजी के शब्द भी उनके भाषण में आए थे। तब वे 'शÓ नहीं बोल पाते थे, शेक्सपियर को सेक्सपियर बोलते। 'जÓ का उच्चारण भी उनके लिए असंभव था। बोलते समय भाषण में उनकी आँखें बंद हो जातीं और लगता वे शून्य को संबोधित कर रहे हैं। बहुत दिनों तक हम लोग छात्रावास में उनके नकियाने और इज, वाज, बिकाज की गाज गिराने की नकल करते रहे थे। अपने अंग्रेजी के प्रोफेसर स्वामीनाथन् साहब की शेक्सपियर की क्लास में जाना होता तो अपने सहपाठी शशिकान्त से कहते–काय ससी, सेक्सपियर पढऩे नहीं चल रये का। पर इस नकियाने और इज, वाज बिकाज की गाज गिराने के बावजूद रजनीश मोहन जैन प्रथम स्थान के अधिकारी घोषित किए गए थे।

Package Dimensions: 9.0 x 6.0 x 0.5 inches

Languages: Hindi

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