Stri-Asmita aur Kavita ka Bhakti Yug (स्त्री-अस्मिता और कविता का भक्तियुग) [Paperback] Shashikala Tripathy (शशिकला त्रिपाठी)

Stri-Asmita aur Kavita ka Bhakti Yug (स्त्री-अस्मिता और कविता का भक्तियुग) [Paperback] Shashikala Tripathy (शशिकला त्रिपाठी)
Author: Shashikala Tripathy (शशिकला त्रिपाठी)
Brand: Anuugya Books
Binding: paperback
Number Of Pages: 262
Release Date: 01-12-2021
Details: भक्ति आन्दोलन में स्त्रियों की भी भूमिका कमोबेश रही है। यद्यपि आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने साहित्येतिहास में उन्हें प्रमुखता नहीं दी, केवल मीरा को फुटकल खाते में दर्ज़ किया। बाद में आचार्य परशुराम चतुर्वेदी ने सहजोबाई, दयाबाई और बावरा देवी का उल्लेख ‘उत्तर भारत की सन्त परम्परा’ में किया है। आश्चर्यजनक यह कि इनकी उपस्थिति ऐसी धारा में पायी जाती है जहाँ सन्त कवि साधना और भक्ति में स्त्रियों का निषेध करते हैं। इसका एक कारण यह था कि सिद्धों ने तान्त्रिक वामाचार करते हुए पंचमकार (मद्य, मांस, मत्स्य, मैथुन, मुद्रा) प्रक्रिया में स्त्रियों का इस्तेमाल किया। हालाँकि सामाजिक रूप से यह सकारात्मक भूमिका थी कि उन्होंने निम्न जाति की स्त्रियों को ‘भैरवी’ या ‘योगिनी’ की उपाधि से नवाजा़। इस तरह, आदिकाल में भी स्त्री को भक्ति-परिप्रेक्ष्य में स्वीकृति मिली थी लेकिन एक वर्ग जमकर उसका विरोध करता रहा। कालान्तर में ललद्यद (कश्मीर), अक्कमहादेवी (कर्नाटक) आंडाल (तमिलनाडु) और मीराबाई (राजस्थान) भक्ति आन्दोलन को महत्त्वपूर्ण बनाने में भास्वर योगदान देकर अपनी महत्त्वपूर्ण उपस्थिति सुनिश्चित करती हैं। चेतना-सम्पन्न ये कवयित्रियाँ पितृसत्तात्मक समाज की अवहेलना करती हैं और भक्ति के बहाने अस्तित्व-संघर्ष करती प्रतीत होती हैं परन्तु, उनके विरोध का स्वरूप पितृसत्तात्मक ही था। परमात्मा-पुरुष को एकमात्र अपना अवलम्बन समझती हुई वे उन पर स्वतः को न्यौछावर करती हैं। प्रपत्ति और ‘शरणागति’ उनकी भक्ति के संसाधन रहे। मात्र ‘राधा’ ही स्त्री के रूप में आराध्या बनीं जिसका श्रेय बल्लभाचार्य के पुत्र विट्ठलनाथ और पौत्र गोकुलनाथ को दिया जाता है।
EAN: 9788195110520
Package Dimensions: 9.8 x 6.3 x 0.8 inches
Languages: Hindi
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Description
Author: Shashikala Tripathy (शशिकला त्रिपाठी)
Brand: Anuugya Books
Binding: paperback
Number Of Pages: 262
Release Date: 01-12-2021
Details: भक्ति आन्दोलन में स्त्रियों की भी भूमिका कमोबेश रही है। यद्यपि आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने साहित्येतिहास में उन्हें प्रमुखता नहीं दी, केवल मीरा को फुटकल खाते में दर्ज़ किया। बाद में आचार्य परशुराम चतुर्वेदी ने सहजोबाई, दयाबाई और बावरा देवी का उल्लेख ‘उत्तर भारत की सन्त परम्परा’ में किया है। आश्चर्यजनक यह कि इनकी उपस्थिति ऐसी धारा में पायी जाती है जहाँ सन्त कवि साधना और भक्ति में स्त्रियों का निषेध करते हैं। इसका एक कारण यह था कि सिद्धों ने तान्त्रिक वामाचार करते हुए पंचमकार (मद्य, मांस, मत्स्य, मैथुन, मुद्रा) प्रक्रिया में स्त्रियों का इस्तेमाल किया। हालाँकि सामाजिक रूप से यह सकारात्मक भूमिका थी कि उन्होंने निम्न जाति की स्त्रियों को ‘भैरवी’ या ‘योगिनी’ की उपाधि से नवाजा़। इस तरह, आदिकाल में भी स्त्री को भक्ति-परिप्रेक्ष्य में स्वीकृति मिली थी लेकिन एक वर्ग जमकर उसका विरोध करता रहा। कालान्तर में ललद्यद (कश्मीर), अक्कमहादेवी (कर्नाटक) आंडाल (तमिलनाडु) और मीराबाई (राजस्थान) भक्ति आन्दोलन को महत्त्वपूर्ण बनाने में भास्वर योगदान देकर अपनी महत्त्वपूर्ण उपस्थिति सुनिश्चित करती हैं। चेतना-सम्पन्न ये कवयित्रियाँ पितृसत्तात्मक समाज की अवहेलना करती हैं और भक्ति के बहाने अस्तित्व-संघर्ष करती प्रतीत होती हैं परन्तु, उनके विरोध का स्वरूप पितृसत्तात्मक ही था। परमात्मा-पुरुष को एकमात्र अपना अवलम्बन समझती हुई वे उन पर स्वतः को न्यौछावर करती हैं। प्रपत्ति और ‘शरणागति’ उनकी भक्ति के संसाधन रहे। मात्र ‘राधा’ ही स्त्री के रूप में आराध्या बनीं जिसका श्रेय बल्लभाचार्य के पुत्र विट्ठलनाथ और पौत्र गोकुलनाथ को दिया जाता है।
EAN: 9788195110520
Package Dimensions: 9.8 x 6.3 x 0.8 inches
Languages: Hindi

















