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VIKAS KI AVDHARNA | विकास की अवधारणा by विनोद कुमार

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VIKAS KI AVDHARNA | विकास की अवधारणा by विनोद कुमार

Author: VINOD KUMAR

Brand: Anuugya

Edition: First Edition

Features:


  • Collection of articles of Vinod Kumar "Jharkhand"

  • Language Published: Hindi

Binding: paperback

Number Of Pages: 168

Release Date: 01-12-2016

Details: विनोद कुमार के लेख---शहर और सपना, गाँधी और गाजा, मुक्ति की राह, तो हारा कौन, दो पाटन के बीच, अपराध और दंड, शहादत की मशाल, हिंसा का हासिल, महुआ का दुख, आधुनिकता का संकट, जीवन की डोर, थोथे अभियान, एमसीसी को लेकर एक स्पष्ट दृष्टि बनाने की जरूरत, एेसे संघर्ष का औचित्य क्या है, नियमगिरि की छत से, भूमिज आदिवासियों की दुनिया, सफर में कमीज़, वे आदिवासी हितों के हितैषी नहीं, आदिवासी संस्कृति के आधार, लोहा नहीं अनाज चाहिए, सुधार के नाम पर, झारणंड की अखंड लूट, इस विकास की कीमत, नीतिविहीन राजनीति का दौर, चुनावी बहस के विरोधाभास, बदला हुआ मध्यम वर्ग, जातीय विद्वेष की जड़ें, ञइस जी़त के निहितार्थ, महँगाई में निहितार्थ, बलात्कार और सामाजिक संरचना, बबुआ से बडा झुनझुना, ओझल आदिवासी समाज, लूट की संस्कृति में श्रम का मोल, कैसे रुकेगा भ्रष्टाचार, तंगी में तरक्की के तरकीब, झारखंड के आईने में, जमीन की लूट का प्रपंच, जमीन किसी की विकास किसी का, व्यवस्था में बद्धमूल विषमता, किसानों की खुदकशी का सबब समाज-हाशिये के लोग।

EAN: 9789383962457

Package Dimensions: 8.5 x 5.6 x 0.5 inches

Languages: Hindi, English

$0.44

Original: $1.26

-65%
VIKAS KI AVDHARNA | विकास की अवधारणा by विनोद कुमार

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Author: VINOD KUMAR

Brand: Anuugya

Edition: First Edition

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  • Collection of articles of Vinod Kumar "Jharkhand"

  • Language Published: Hindi

Binding: paperback

Number Of Pages: 168

Release Date: 01-12-2016

Details: विनोद कुमार के लेख---शहर और सपना, गाँधी और गाजा, मुक्ति की राह, तो हारा कौन, दो पाटन के बीच, अपराध और दंड, शहादत की मशाल, हिंसा का हासिल, महुआ का दुख, आधुनिकता का संकट, जीवन की डोर, थोथे अभियान, एमसीसी को लेकर एक स्पष्ट दृष्टि बनाने की जरूरत, एेसे संघर्ष का औचित्य क्या है, नियमगिरि की छत से, भूमिज आदिवासियों की दुनिया, सफर में कमीज़, वे आदिवासी हितों के हितैषी नहीं, आदिवासी संस्कृति के आधार, लोहा नहीं अनाज चाहिए, सुधार के नाम पर, झारणंड की अखंड लूट, इस विकास की कीमत, नीतिविहीन राजनीति का दौर, चुनावी बहस के विरोधाभास, बदला हुआ मध्यम वर्ग, जातीय विद्वेष की जड़ें, ञइस जी़त के निहितार्थ, महँगाई में निहितार्थ, बलात्कार और सामाजिक संरचना, बबुआ से बडा झुनझुना, ओझल आदिवासी समाज, लूट की संस्कृति में श्रम का मोल, कैसे रुकेगा भ्रष्टाचार, तंगी में तरक्की के तरकीब, झारखंड के आईने में, जमीन की लूट का प्रपंच, जमीन किसी की विकास किसी का, व्यवस्था में बद्धमूल विषमता, किसानों की खुदकशी का सबब समाज-हाशिये के लोग।

EAN: 9789383962457

Package Dimensions: 8.5 x 5.6 x 0.5 inches

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