✨ New Arrivals Just Dropped!Explore
HomeStore

Zindan-Nama

Product image 1

Zindan-Nama

Author: Faiz Ahmed Faiz

Brand: Rajkamal Prakashan

Binding: paperback

Number Of Pages: 112

Release Date: 01-09-2020

Details: मुहब्बत और इनक़लाब की तरफ़दारी फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की शाइरी का बुनियादी स्वर है और रोमान इस शाइरी के तेवर का ख़ास पहलू। प्रगतिशील मूल्यों की तरफ़दारी करनेवाली इस शाइरी के असर का अन्दाज़ा इससे लगाया जा सकता है कि फ़ैज़ के जीते-जी यह उनके मुल्क और भाषा की सरहदों को पार कर दुनिया-भर के शोषित-पीड़ित अवाम की आवाज़ बन गई। और यह सिलसिला आज भी जारी है। ‘ज़िन्दाँनामा’ का इस सन्दर्भ में विशेष महत्त्व है। यह फ़ैज़ का तीसरा कविता-संग्रह है, उनके दूसरे कविता-संग्रह ‘दस्ते-सबा’ की तरह उनके जेलख़ाने का यादगार। यह संग्रह इस बात का एक और साक्ष्य है कि फ़ैज़ जिन उसूलों की बात कर रहे थे, वे उनके लिए सिर्फ़ ख़याल तक सीमित नहीं थे, बल्कि उनके लिए उन्होंने क़ैद भी काटी। और दमन के तमाम वार झेलते हुए भी उनकी आवाज़ की बुलन्दी क़ायम रही। इसमें शामिल अधिकतर चीज़ें जुलाई 1953 से मार्च 1955 के बीच की हैं, जिस दौरान फ़ैज़ मांटगुमरी सेंट्रल जेल और लाहौर सेंट्रल जेल में क़ैद थे। तब बाहरी दुनिया से दूर हो जाने के कारण चिन्तन-मनन के लिए जो मोहलत मिल गई थी, उसने उनके ख़यालों की सुर्ख़ी और बढ़ा दी। इस संग्रह की एक यादगार बात यह भी है, इसकी प्रस्तावना प्रगतिशील आन्दोलन की दिग्गज हस्ती और फ़ैज़ के मित्र सैयद सज्जाद ज़हीर ने लिखी है।.

EAN: 9789389598445

Package Dimensions: 7.8 x 5.1 x 0.4 inches

Languages: Hindi

$2.53
Zindan-Nama
$2.53

Product Information

Shipping & Returns

Description

Author: Faiz Ahmed Faiz

Brand: Rajkamal Prakashan

Binding: paperback

Number Of Pages: 112

Release Date: 01-09-2020

Details: मुहब्बत और इनक़लाब की तरफ़दारी फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की शाइरी का बुनियादी स्वर है और रोमान इस शाइरी के तेवर का ख़ास पहलू। प्रगतिशील मूल्यों की तरफ़दारी करनेवाली इस शाइरी के असर का अन्दाज़ा इससे लगाया जा सकता है कि फ़ैज़ के जीते-जी यह उनके मुल्क और भाषा की सरहदों को पार कर दुनिया-भर के शोषित-पीड़ित अवाम की आवाज़ बन गई। और यह सिलसिला आज भी जारी है। ‘ज़िन्दाँनामा’ का इस सन्दर्भ में विशेष महत्त्व है। यह फ़ैज़ का तीसरा कविता-संग्रह है, उनके दूसरे कविता-संग्रह ‘दस्ते-सबा’ की तरह उनके जेलख़ाने का यादगार। यह संग्रह इस बात का एक और साक्ष्य है कि फ़ैज़ जिन उसूलों की बात कर रहे थे, वे उनके लिए सिर्फ़ ख़याल तक सीमित नहीं थे, बल्कि उनके लिए उन्होंने क़ैद भी काटी। और दमन के तमाम वार झेलते हुए भी उनकी आवाज़ की बुलन्दी क़ायम रही। इसमें शामिल अधिकतर चीज़ें जुलाई 1953 से मार्च 1955 के बीच की हैं, जिस दौरान फ़ैज़ मांटगुमरी सेंट्रल जेल और लाहौर सेंट्रल जेल में क़ैद थे। तब बाहरी दुनिया से दूर हो जाने के कारण चिन्तन-मनन के लिए जो मोहलत मिल गई थी, उसने उनके ख़यालों की सुर्ख़ी और बढ़ा दी। इस संग्रह की एक यादगार बात यह भी है, इसकी प्रस्तावना प्रगतिशील आन्दोलन की दिग्गज हस्ती और फ़ैज़ के मित्र सैयद सज्जाद ज़हीर ने लिखी है।.

EAN: 9789389598445

Package Dimensions: 7.8 x 5.1 x 0.4 inches

Languages: Hindi

Zindan-Nama | Explore Millions of Books