
Zindgi kee Mahak aur Anya Kahaniyan -- ज़िन्दगी की महक और अन्य कहानियाँ
Author: Narendra Nirmal -- नरेन्द्र निर्मल
Brand: Anuugya Books
Edition: Ist
Binding: perfect
Number Of Pages: 160
Release Date: 01-12-2022
Details: सहेलियाँ और पीहरवाले मेरा भाग्य सराहते। कभी जब मैं अपने-आप से प्रश्न करती हूँ तो यही सवाल पूछती हूँ–क्या मैं इस काबिल थी। इतना सुख और ऐशोआराम मेरे भाग्य में लिखा था। लेकिन मन का एक छोटा-सा कोना फिर भी खाली। प्रतीक्षारत। क्यूँ और किसके लिए, यह बताना अत्यन्त मुश्किल। जब मैं बारह-तेरह साल की थी तब एक सपना बार-बार आता था। एक व्यक्ति रेलवे स्टेशन से बाहर आकर ताँगे में बैठता है। मैं सामने से पैदल आ रही हूँ। मुझे देखते ही वह ताँगा रुकवा देता है और नीचे उतर कहता है–मैंने तुझे कहाँ-कहाँ नहीं ढूँढ़ा। तू कहीं नहीं मिली। सोचा, शायद तू मर गई होगी। पर तू तो ज़िन्दा है। चल मेरे साथ, अब मुझे छोड़कर कभी मत जाना। मेरा हाथ पकड़कर वह मुझे अपने साथ ले चलता है। मैं सपने में भी उसका चेहरा गौर से देखना चाहती हूँ पर कभी कोई शक्ल नहीं उभरती। आँखें, चेहरा कुछ भी साफ नहीं दिखाई देता। आवाज सुनाई देती है, एकदम स्पष्ट। पुरुष के शरीर की अनुभूति होती है। सम्पूर्ण तन-मन कहता है, यह वही है जिसकी प्रतीक्षा है। हजारों बार यह सपना मेरी नींद में आता रहा है, अब भी आता है, पर इन्तजार खत्म नहीं हुआ। जिस रात यह सपना आता है वो दिन बहुत खुशनुमा होता है। सारे दिन मन में उमंग भरी रहती है। राजेश को यह सपना सैकड़ों दफा सुना चुकी हूँ। सुबह-सुबह मेरा चेहरा पढ़कर ही कह देता है– रात सपने में तेरे वो आए थे क्या? और मेरे चेहरे की लाली पढ़कर मेरी मनोदशा भाँप जाते हैं। मैंने एक दिन राजेश से कहा : “कहीं मैं किसी मनोरोग की शिकार तो नहीं हूँ? यह मेरे मन की कौन-सी अतृप्त इच्छा है। लाइफ का कौन-सा इम्प्रेशन है? मुझे एक बार साइकोलॉजिस्ट से चेक करवा दीजिए।” ...इसी पुस्तक से...
Package Dimensions: 9.0 x 6.0 x 0.5 inches
Languages: Hindi
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Description
Author: Narendra Nirmal -- नरेन्द्र निर्मल
Brand: Anuugya Books
Edition: Ist
Binding: perfect
Number Of Pages: 160
Release Date: 01-12-2022
Details: सहेलियाँ और पीहरवाले मेरा भाग्य सराहते। कभी जब मैं अपने-आप से प्रश्न करती हूँ तो यही सवाल पूछती हूँ–क्या मैं इस काबिल थी। इतना सुख और ऐशोआराम मेरे भाग्य में लिखा था। लेकिन मन का एक छोटा-सा कोना फिर भी खाली। प्रतीक्षारत। क्यूँ और किसके लिए, यह बताना अत्यन्त मुश्किल। जब मैं बारह-तेरह साल की थी तब एक सपना बार-बार आता था। एक व्यक्ति रेलवे स्टेशन से बाहर आकर ताँगे में बैठता है। मैं सामने से पैदल आ रही हूँ। मुझे देखते ही वह ताँगा रुकवा देता है और नीचे उतर कहता है–मैंने तुझे कहाँ-कहाँ नहीं ढूँढ़ा। तू कहीं नहीं मिली। सोचा, शायद तू मर गई होगी। पर तू तो ज़िन्दा है। चल मेरे साथ, अब मुझे छोड़कर कभी मत जाना। मेरा हाथ पकड़कर वह मुझे अपने साथ ले चलता है। मैं सपने में भी उसका चेहरा गौर से देखना चाहती हूँ पर कभी कोई शक्ल नहीं उभरती। आँखें, चेहरा कुछ भी साफ नहीं दिखाई देता। आवाज सुनाई देती है, एकदम स्पष्ट। पुरुष के शरीर की अनुभूति होती है। सम्पूर्ण तन-मन कहता है, यह वही है जिसकी प्रतीक्षा है। हजारों बार यह सपना मेरी नींद में आता रहा है, अब भी आता है, पर इन्तजार खत्म नहीं हुआ। जिस रात यह सपना आता है वो दिन बहुत खुशनुमा होता है। सारे दिन मन में उमंग भरी रहती है। राजेश को यह सपना सैकड़ों दफा सुना चुकी हूँ। सुबह-सुबह मेरा चेहरा पढ़कर ही कह देता है– रात सपने में तेरे वो आए थे क्या? और मेरे चेहरे की लाली पढ़कर मेरी मनोदशा भाँप जाते हैं। मैंने एक दिन राजेश से कहा : “कहीं मैं किसी मनोरोग की शिकार तो नहीं हूँ? यह मेरे मन की कौन-सी अतृप्त इच्छा है। लाइफ का कौन-सा इम्प्रेशन है? मुझे एक बार साइकोलॉजिस्ट से चेक करवा दीजिए।” ...इसी पुस्तक से...
Package Dimensions: 9.0 x 6.0 x 0.5 inches
Languages: Hindi

















